विभीषण गीता : भगवान श्री राम का विजय रथ

श्रीमदभगवदगीता के बारे में आप सबने सुना होगा| भारतीय दर्शन के विशाल सागर में गीता एक बहुमूल्य मोती है| गीता का शाब्दिक अर्थ है “गीत” या “गान”, अतः काव्यात्मक कृतियों के माध्यम से ज्ञानयोग द्वारा मोक्ष का मार्ग दिखाने वाली कृतियाँ गीता कही जा सकती हैं| गोस्वामी तुलसीदासकृत रामचरितमानस में ऐसे कई प्रसंग हैं|आज हम आपके साथ भगवान श्री राम और विभीषण जी के बीच रणभूमि में होने वाले संवाद  को साझा कर रहे हैं| “धर्म” यानी religion को लेकर अनेकों मत हो सकते हैं|(religion अधिक उपयुक्त है! हिंदी में धर्म का अर्थ बहुत ही व्यापक है! धर्म का पालन सभी जन करते हैं, दुःख का विषय है कि आजकल धर्म का अर्थ अलग प्रकार से लिया जाता है )  मंथन पर लिखने वालों के भी religion को लेकर अनेकों मत हैं! पर religion में आपकी आस्था जो भी हो, यह भाग सभी के लिए आज भी इसलिए बहुत सार्थक है क्योंकि

  • यह काव्यात्मक दृष्टि से अत्यंत सुन्दर है| तुलसीदास जी ने रूपकों का बहुत सटीक प्रयोग किया है|
  • यह एक ऊंची बौद्धिक उड़ान है और आपको सोचने के लिए एक खुला आकाश देती है| भारतीय दर्शन के मूल सिद्धांतों को यहाँ बहुत ही मनभावन तरीके से प्रस्तुत किया गया है|
  • अधिकतर प्रसंगों की तरह यह प्रेरणादायक है और जीवन के लिए उपयोगी साबित हो सकती है (स्वयं विचार कीजिये!)
    इसीलिए हमने इस रोचक प्रसंग पर अपनी सीमित समझ से व्यापक धर्म (जिसमें सभी religion, आस्तिक, नास्तिक आदि सभी शामिल हैं) के परिप्रेक्ष्य में मंथन करने का प्रयास किया है| किसी भी त्रुटी के लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं| आपके विचारों का खुलकर स्वागत है, और आप हमें contact करके इस मंथन पर अपने विचार जोड़ सकते हैं|

दोहा– दुहु दिसि जय जयकार करि, निज निज जोरी जानि।
भिरे बीर इत रामहि, उत रावनहि बखानि॥

अधर्म के विरुद्ध धर्म, असत्य के विरुद्ध सत्य, अन्याय के विरुद्ध न्याय आज अपनी चुनौती लेकर खड़ा था| दोनों ही पक्षों के वीर, अपनी पूरी शक्ति के साथ सुसज्जित खड़े थे| एक ओर अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित रावण की असुर सेना, दूसरी ओर वृक्ष, चट्टान आदि उठाये भगवान राम की वानर और रीछों की सेना| अपने समय और ऐतिहासिकता से परे भी इस युद्ध का गूढ़ प्रतीकात्मक महत्त्व है| हम सभी के भीतर यह युद्ध छिड़ा रहता है| धर्म और अधर्म दोनों अपने हथियारों से लैस प्रत्येक मानव के भीतर एक राम-रावण संग्राम में निरत रहते हैं|

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥
अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥
नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥

एक ओर रावण अस्त्र-शस्त्रों से लदे अपने विशाल रथ पर सवार चला आ रहा था, दूसरी ओर भगवान राम धरती पर नंगे पाँव खड़े थे| यह देखकर भगवान राम के प्रति अपने प्रेम से अधीर होकर विभीषण जी कहते हैं, “हे नाथ! न आपके पास रथ है, ना ही आपके पैरों में जूते तक हैं| रावण जैसे बलवान वीर से आप किस प्रकार जीत सकेंगे?”

 सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥

युद्ध के समय ऐसी शंका को अपनी आलोचना समझकर कोई क्रोध में भी आ सकता है! आजकल की राजनीति और सोशल मीडिया पर आलोचना को लेकर कड़वाहट भरी बयानबाजी आम बात है| परन्तु भगवान राम हमें सिखाते हैं कि ऐसे वचन सुनकर विचलित नहीं होना चाहिए| कृपानिधान भगवान राम मुस्कराते हुए कहते हैं , “सुनो मित्र! जिस रथ से विजय होती है, वह रथ ऐसा होता है..”
ऐसा कहकर भगवान राम ऐसे अद्वितीय रथ का वर्णन करते हैं, जिससे हम संसार रुपी इस रणभूमि में  निरंतर चलने वाले राम-रावण के महासंग्राम में विजय प्राप्त कर सकते हैं

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥

wheels

जीवन-रण के विजय-रथ में शौर्य और धैर्य रुपी दो पहिये होते हैं| पथ की विषमता को देखकर बिना घबराये हुए आगे लेके चलते जाना शौर्य से संभव है|निरंतर इन विषमताओं के गड्ढों से टकराते हुए भी चलते जाना धैर्य से संभव है| इन दोनों के बीच रथ के पहियों की तरह संतुलन भी आवश्यक है, जितना अधिक शौर्य वाला पथ आप चुनेंगे, उतना ही धैर्य भी आपको रखना होगा!

Flag

रणभूमि में रथ पर सवार रथी की पहचान के लिए रथ पर ध्वज और पताका (ध्वज के नीचे उससे थोड़े छोटे ध्वज को पताका कहते हैं) होते हैं| जब तक ध्वज और पताका रणभूमि में दिखती रहती है, रथी सकुशल माना जाता है| उदाहरणार्थ अर्जुन के रथ पर वानरी ध्वज होता था, जिसको दूर से देखकर ही पांडव सेना में उत्साह और कौरव सेना में भय की लहर दौड़ जाती थी! भगवन राम के बताये जीवन-रण के विजय-रथ का ध्वज सत्य है, जो व्यक्तित्व की पहचान बनता है| लोग ऐसे व्यक्ति की बातों को गंभीरता से लेते हैं और उसपर विश्वास करते हैं| जो लोग पल-प्रतिपल सुविधानुसार असत्य का साथ लेने में नहीं चूकते, उनको पहचानना कठिन है| ऐसे लोग कभी भी कोई सन्देश दूसरों तक नहीं पहुंचा सकते| सत्य के साथ ही इस विजय-रथ पर  शील भी जुड़ा होता है| कुछ शब्द हिंदी में ऐसे हैं जिनका अर्थ अत्यंत गूढ़ होता है: भाव आप समझ सकते हैं, पर दूसरे शब्दों से इनकी व्याख्या कठिन है| हमारे विचार से शील भी एक ऐसा शब्द है| शील भी व्यक्तित्व का एक गुण है, हम अपनी सीमित शब्दावली से इसके भाव को सीमित करना नहीं चाहते, सो आप स्वयं विचार करें कि शील के पताका का क्या अर्थ है 🙂

बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥

horses

जीवन के रण में विजय दिलाने वाले इस रथ के चार घोड़े हैं: बल, विवेक, दम और परहित यानी दूसरों की भलाई करना|

  • बल केवल शारीरिक ही नहीं, अपितु मानसिक भी होना चाहिए| विज्ञान में बल की परिभाषा है: जो चलते को रोक दे, गति या दिशा बदल दे, रुके को चला दे वही बल है| स्वयं इस परिभाषा से विचार कीजिये कि भगवान राम के विजय रथ का यह घोड़ा जीवन-रथ को किस प्रकार खींचता है!
  • विवेक का अर्थ है किसी भी बात के अलग अलग पक्षों को समझ पाना|विवेक की सहायता से ही हम जीवन  में कोई भी निर्णय ठीक प्रकार से ले सकते हैं| आजकल मीडिया, सोशल मीडिया पर फैले प्रोपगंडा के शोर कारण विवेक का महत्त्व और भी बढ़ जाता है| किसी भी मुद्दे को सिर्फ दो पक्षों में बांटकर रख दिया जाता है: या तो आप पूर्णतया पक्ष में हैं या पूर्णतया विपक्ष में| विवेक की नुकीली सुई से सूक्ष्म विवेचना के द्वारा ही व्यक्ति व समाज के चरित्र के शिल्प को सुन्दरता से गढ़ा जा सकता है| राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी भी अपनी कालजयी कृति रश्मिरथी में कहते हैं : “जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है|” इतिहास साक्षी है कि जब-जब लोग विवेक के बजाय भावनाओं से काम लेने लगते हैं, विनाश के सिवा कुछ हाथ नहीं आता| जर्मनी की  द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका और हिटलर के हाथों हुआ नरसंहार विवेक के घोड़े के न रहने के कारण रथ की दिशा भटकने का ही परिणाम है|
  • दम को कई बार बल का पर्यायवाची समझा जाता है, परन्तु इसका अर्थ थोड़ा अलग है| दम किसी भी परिस्थिति में दृढ़ता पूर्वक खड़े रहने का गुण है| बलवान होने पर भी व्यक्ति में अगर दम ना हो तो वह ज़रा सी भी विकट परिस्थिति में भाग खड़ा होगा| दिनकर जी ने भी अपनी महान कृति कुरुक्षेत्र में कहा है “जीवन उनका नहीं युधिष्ठिर जो उससे डरते हैं, यह उनका जो चरण रोप निर्भय होकर लड़ते हैं|”
  • अगर कोई महान लक्ष्य ना हो तो बाकी तीन घोड़े आपको कहीं भी नहीं ले जायेंगे! परहित का घोड़ा वास्तव में प्रेरणा का स्रोत है| लक्ष्य सिर्फ अपने तक सीमित रखना एक बहुत मामूली लक्ष्य है, स्वयं के लिए आप कितना ही कर सकते हैं, अपनी क्षमताओं को कितना ही विकसित सकते हैं? पर यदि आपने जीवन में दूसरों की सहायता का लक्ष्य साध रखा है, तो आप परहित के चौथे घोड़े से अपनी सीमाओं को निरंतर चुनौती देते हुए अपने बाकी तीन घोड़ों बल, विवेक और दम को भी पुष्ट बनायेंगे| इससे आपके स्वयं के सामर्थ्य में भी वृद्धि होगी और कुछ भी आपके लिए असंभव नहीं रहेगा| तुलसीदास जी ने स्वयं कहा है “परहित बस जिन्ह के मन मांही| तिन्ह कहू जग दुर्लभ कछु नाहीं||”यही नहीं परहित का यह घोड़ा आपको खुद की शंकाओं के झाड़ियों से भी तेजी से बाहर ले जा सकता है! हमारे बचपन में गांधीजी का यह जंतर हर पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर होता था| यदि देशों की सरकारें अपने निर्णयों में गांधीजी का यह जंतर प्रयोग में लायें तो कितना अच्छा हो!gandhi ji ka jantar
  • अब आते हैं इन 4 घोड़ों को नियंत्रित करने वाली 3 रस्सियों या लगाम पर|  चार शक्तिशाली घोड़ों के होने पर किसी का भी एक घोड़े की ही तरह अड़ियल हो जाना संभव हो सकता है! यह आपके जीवन रथ को अहंकार और द्वेष की तरफ ले जा सकते हैं| ऐसे में भगवान राम बताते हैं कि दंड देने का बल होने पर भी क्षमा और दया की संभावना हमेशा बनाये रखनी चाहिए| रावण के जघन्य अपराधों के बाद भी भगवान राम ने दया दिखाते हुए उसे क्षमा करने के अनेक अवसर प्रदान किये| सामर्थ्य होने पर भी अपने से कम सामर्थ्यवान की सहायता करके समता बनाए रखनी चाहिए| ऐसी बातें आपको हमेशा तर्कशील नहीं लगेंगी! इसीलिए इनको इन घोड़ों की लगाम कहा गया है|भगवान राम इसीलिए क्षमा, दया और समता के लिए हमेशा संभावना रखने को कहते हैं|

ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥

Sarathi

इन घोड़ों और लगाम को संभालकर रथ को चलाने वाला सारथी कौन है? सारथी है “ईश भजन”| ईश शब्द “ईष्ट” से आता है, जिसका अर्थ है इच्छित या जिसकी इच्छा की जाये| अच्छे या आदर्श गुण सभी के लिए इच्छित होते हैं| इसीलिए आदर्श की पराकाष्ठा को ईश्वर कहा जाता है| अतः “ईश भजन”का अर्थ है अपने आदर्शों को सदा अपने दिमाग में दोहराते हुए स्मरण रखना है| अपने आदर्शों की दृष्टि से ही इस रथ को कुशलतापूर्वक चलाया जा सकता है|

आगे की पंक्तियों में भगवान राम इस रथ के आयुधों या हथियारों का वर्णन करते हैं| हथियार क्यों चाहिए? हथियार चाहिए शत्रुओं के संहार के लिए! अतः इन पंक्तियों में हथियारों के माध्यम से असल में भगवान राम जीवन के शत्रुओं का वर्णन भी कर रहे हैं!

ShieldFinal

 

  • बिरति यानी वैराग्य चर्म यानी ढाल है| वैराग्य की ढाल मोह से हमारी रक्षा करती है| जीवन में कई गलत निर्णय मोह के कारण लिए जाते हैं| मोह हमें अपनी सीमाओं को लांघने से भी वंचित रखता है| स्वयं विचार करें की दैनिक जीवन में आपकी कितनी सारी चिन्ताएं मोह के कारण हैं! श्रीमदभगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण भी मोह को सर्वनाश का कारण बताते हुए कहते हैं :
    ध्यायतो विषयान् पुन्सः संगस्तेषु उपजायते , सङ्गात् संजायते कामः ,कामात्  क्रोधः अभिजायते |
    क्रोधात् भवति सम्मोहः ,सम्मोहात् स्मृति विभ्रमः ,स्मृतिभृन्षात् बुद्धिनाशो ,बुद्धिनाशात् प्रनश्यते ||
     संस्कृत के अध्ययन का सबसे बड़ा फायदा यही है कि यह श्लोक सीधा मन में उतर जाता है| हमारा इसके अनुवाद का कोई भी प्रयत्न मूल भाव और इसकी सुन्दरता के आगे सूर्य को दिया दिखाने के सामान होगा| इसीलिए आप शंकराचार्य, माधवाचार्य (इन्होने गणित में आजकल कहे जाने वाले Taylor Series को भी भारत में विकसित किया था), रामानुज आदि महान व्यक्तित्त्वों की व्याख्या को यहाँ स्वयं पढ़ लें|
    http://dharmic-jeevan.blogspot.com/2011/05/bhagvatgita-02-62.html
    इसलिए सर्वनाश से बचने के लिए वैराग्य की ढाल का प्रयोग करें|SwordFinal
  • संतोष कृपाण यानी तलवार है जो कि अति महत्त्वाकांक्षा को काटती है| जीवन में अगर संतोष न हो तो पल प्रतिपल और अधिक पा लेने की चिंता में बीतता है| अति महत्त्वाकांक्षा बड़े से बड़े शक्तिशाली लोगों को भी घुटनों पर ला सकती है| इसलिए संतोष की तलवार से अति महत्त्वाकांक्षा को काटते रहें|

    दान परसु बुद्धि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥

     

    AxeFinal

  • संचय यानी कंजूसी के शत्रु के संहार के लिए दान रुपी परशु या फरसा है| कंजूसी मोह और आकर्षण से जन्म लेती है|दान के फरसे से कंजूसी को काटते रहने से धन-संपत्ति के मोह और आकर्षण से मुक्ति मिलती है, और आप स्वयं विचार कीजिये कि धन की चिंता ना हो तो जीवन कितना सुगम होगा 🙂 !Bowfinal
    ShaktiFinal
  • ढाल, तलवार और फरसा पास के हथियार हैं, जिन्हें शस्त्र कहते हैं| इनसे पास स्थित शत्रुओं से लोहा लिया जा सकता है| अपने अन्दर के मोह, महत्त्वाकांक्षा और कंजूसी के लिए यह शस्त्र उपयुक्त हैं| पर दूर के शत्रुओं के लिए जिन हथियारों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें अस्त्र कहते हैं| शक्ति ऐसा ही एक दिव्यास्त्र है: भगवान राम बुद्धि को दिव्यास्त्र बताते हैं और विज्ञान को दिव्यास्त्रों को चलाने वाला मज़बूत धनुष| यहाँ विज्ञान शब्द का प्रयोग बहुत महत्त्वपूर्ण है| विज्ञान का सरल अर्थ है कि हर बात में तर्क या logic की खोज करना और तर्कहीन बातों को नकार देना| अगर आपने किसी भी बात में पूछा है “ऐसा क्यों?” तो मुबारक हो! आप वैज्ञानिक हैं! इसके लिए science की डिग्री की आवश्यकता नहीं है| डिग्री लेकर भी कुछ लोग वैज्ञानिक नहीं हो पाते|Scientist not scientist
    भारत में प्राचीनकाल से ही शास्त्रार्थ और तर्क की परम्परा रही है| मौलिक तार्किक विचारों को पुराने समय में भी विज्ञान कहा जाता था| तुलसीदास जी एक जगह कहते हैं “सुक जनकादी सिद्ध मुनि नारद| जे मुनिबर बिग्यान बिसारद||”  शुक, जनक और नारद ऋषि थे (सीताजी के पिता महाराज जनक मिथिला के राजा भी थे, परन्तु उनके ज्ञान ऋषियों जैसा ही था!) जो दर्शनशास्त्र के विशेषज्ञ थे| यहाँ इनको विज्ञान विशारद कहा गया है! आजकल कई जगह, विशेषकर सोशल मीडिया पर लोग कहने सुनने पर क्रोधित हो जाते हैं और परम्परा की दुहाई देने लगते हैं| समाज की कई कुरीतियाँ और खतरनाक अंधविश्वास ऐसे ही परम्परा के नाम पर चलते आ रहे हैं| विज्ञान और तर्क के धनुष पर सवार होकर बुद्धि के दिव्यास्त्र से हमारे चारों ओर दूसरों के फैलाए अज्ञान का दूर-दूर तक जाकर वध करने की क्षमता रखता है|


अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥

QuiverFinal

  • अमल अचल मन त्रोण यानी तरकश के सामान है| तरकश में कई तीर रहते हैं| इसी प्रकार दिन-प्रतिदिन के जीवन रुपी युद्ध में बने रहने के लिए हमें अमल अचल मस्तिष्क चाहिए| विचारों में स्पष्टता और ईर्ष्या, क्रोध, घृणा आदि किसी भी प्रकार की दुर्भावना से मुक्त रहने वाला मस्तिष्क अमल है| सभी प्रकार के भटकावों (जिनकी आजकल संख्या फेसबुक आदि के कारण बहुत अधिक है) से बचकर एकाग्र रहने वाला मन अचल है| निरंतर अभ्यास से अमल अचल मन प्राप्त किया जा सकता है| ऐसे मन में किस प्रकार के शिलीमुख यानी तीर रहते हैं? भगवान राम सम, यम और नियम को तीर बताते हैं|सम यानी दुःख सुख में सामान भाव रखना, यम और नियम महर्षि पतंजलि  अष्टांग योग के दो अंग हैं| यम के अंतर्गत पांच सामजिक कर्त्तव्य आते हैं: अहिंसा (शब्दों, विचारों और कर्मों में ), सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (इन्द्रिय के सुखों में संयम रखना) और अपरिग्रह (किसी भी चीज को जरूरत से ज्यादा  इकठ्ठा न करना)| नियम के अंतर्गत पांच व्यक्तिगत कर्त्तव्य आते हैं: शौच (शरीर और मन को साफ़ रखना) , संतोष, तप (स्वयं अपने अनुशासन में रहना), स्वाध्याय (खुद से अध्ययन करके अपनी समझ का विस्तार करना) और ईश्वर-प्रणिधान (अपने आदर्शों को ध्यान में रखना)| यम और नियम दैनिक जीवन के रण में अक्सर प्रयोग में आते हैं, इसलिए तरकश के तीरों से इनकी तुलना की गयी है|

कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥

 

kavach

[महारथी कर्ण का प्रसिद्ध कवच, छविस्रोत:Ramayan 3392 A.D.]

  • गुरुजनों और विप्र यानी ज्ञानी लोगों के प्रति सम्मान रखना कवच है| जीवन की सभी समस्याओं का समाधान एक ही व्यक्ति के पास होना संभव नहीं है| इसलिए यह आवश्यक है कि दूसरों से सीखा जाये| यदि ज्ञानी लोगों के प्रति हमारा सम्मान बना रहेगा तो उनकी सहायता से जीवन में हमारे ऊपर होने वाले प्रहार सहन करने के लिए हम अधिक उपयुक्त बनेंगे| यहाँ यह विचार कीजिये कि गुरु या विप्र कोई भी हो सकते हैं| हमारी लोक कथाओं में ही कई बार बाल रूप, भिक्षु रूप आदि में कई बार ज्ञान की बातें बताई गयी हैं| इसलिए जिनको सामाजिक दृष्टि से गुरु या विप्र कहा जाता है, असल में गुरु या विप्र उससे कहीं अधिक व्यापक हो सकते हैं| आपसे उम्र में छोटे, धन संपत्ति में आपसे कम, किसी भी लिंग या सम्प्रदाय से गुरु या विप्र अपने ज्ञान से हमारी रक्षा कर सकते हैं| (यहाँ यह बताना आवश्यक है कि मंथन की जन्मभूमि बनारस में सभी एक दूसरे को अक्सर ‘गुरु’ कहकर संबोधित करते हैं!)

सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥


ऐसे महान रथ का वर्णन करके भगवान राम कहते हैं कि इसके सामान जीवन में विजय पाने का कोई और उपाय नहीं है| जो कोई भी ऐसे महान रथ पर सवार होता है, उसके जीतने के लिए कहीं भी कोई भी शत्रु बचता ही नहीं है!

दोहा– महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।
जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥८०(क)॥

हे मतिधीर मित्र विभीषण!  जिसके पास ऐसा सुदृढ़ रथ हो, वह वीर संसार रुपी इस महासमर में विजय प्राप्त कर सकता है|

 पंडित छन्नूलाल मिश्र जी की दिव्य वाणी में विभीषण गीता का आनंद लें|

 


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