“हे रघुनन्दन ! यह सब फेसबुक की माया है !”

महामुनि, धैर्य की प्रतिमूर्ति , भगवान श्रीराम  एक अँधेरी गुफा में लक्ष्मण जी के साथ बैठे थे | बाली वध के पश्चात सुग्रीव को सिंहासनासीन किये काफी समय बीत गया था | परन्तु सुग्रीव की ओर से कोई सन्देश नहीं आया | सीता माता के हरण के बाद एक एक क्षण एक एक युग के सामान काटते हुए भी  भगवान राम ने सुग्रीव को राजकाज संभालने के लिए समय देना उचित समझा और सीता जी की खोज में सुग्रीव की सहायता के वचन की आस लगाये बैठे रहे |

बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई॥
एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालुह जीति निमिष महुँ आनौं॥
(वर्षा बीत गई, निर्मल शरद्ऋतु आ गई, परंतु हे तात! सीता की कोई खबर नहीं मिली। एक बार कैसे भी पता पाऊँ तो काल को भी जीतकर पल भर में जानकी को ले आऊँ॥)

कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आनउँ सोई॥
सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी॥
(कहीं भी रहे, यदि जीती होगी तो हे तात! यत्न करके मैं उसे अवश्य लाऊँगा। राज्य, धन , नगर और स्त्री पा गया, इसलिए सुग्रीव ने भी मेरी सुध भुला दी॥)

जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली॥
जासु कृपाँ छूटहिं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा॥
(जिस बाण से मैंने बालि को मारा था, उसी बाण से कल उस मूढ़ को मारूँ! (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! जिनकी कृपा से मद और मोह छूट जाते हैं उनको कहीं स्वप्न में भी क्रोध हो सकता है? (यह तो लीला मात्र है)॥)

जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी॥
लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाई गहे कर बाना॥
ज्ञानी मुनि जिन्होंने श्री रघुनाथजी के चरणों में प्रीति मान ली है , वे ही इस चरित्र (लीला रहस्य) को जानते हैं। लक्ष्मणजी ने जब प्रभु को क्रोधयुक्त जाना, तब उन्होंने धनुष चढ़ाकर बाण हाथ में ले लिए॥)

तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव।
भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव॥
(तब दया की सीमा श्री रघुनाथजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को समझाया कि हे तात! सखा सुग्रीव को केवल भय दिखलाकर ले आओ (उसे मारने की बात नहीं है)॥)

महावीर लक्ष्मण जी ने प्रभु के चरण स्पर्श किये और अपना विकराल धनुष उठाकर किष्किन्धा की ओर चल दिए | किष्किन्धा में उनके तेजस्वी स्वरुप को देखकर ही सभी वानर इधर उधर भागने लगे | परन्तु कहीं कहीं उन्होंने कुछ वार्तालाप सुने , जिनसे उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा !

वानर १ ” अरे ! यह तो वही भयंकर योद्धा है जिसने बेचारी शूर्पणखा की नाक काट दी थी ” (यहाँ ज्ञात हो की शूर्पणखा ने सीता माता पर आक्रमण कर रही थी |)

वानर २ ” अरे हाँ ! भाग लो भैया ! सुना है क्रोध में इसको जो भी सामने दिख जाये उसकी नाक काट लेता है | अपनी कुटिया में कटी हुयी नाकों का एक संग्रह बना रखा है इसने !”

वानर ३ “इसने और इसके  क्षत्रिय भाई राम ने , महापंडित रावण के वध की योजना बनायी है | सीताहरण तो मात्र बहाना है, इनको रघुकुल का शक्ति प्रदर्शन करना है |”

वानर ४ ” बेचारा रावण ! वह तो सिर्फ संगीत और शास्त्रों में रुचि रखता है | लंका की जनता उसके शासन में अत्यंत सुखी है | किष्किन्धा से उसकी मित्रता की संधि भी है | पर यह लोग अपनी अयोध्या की सेना से आक्रमण क्यों नहीं करते ?”

वानर ५ ” अरे मूर्ख ! अपनी सेना को बलि कौन चढ़ाये ? यह महाराज सुग्रीव जी  की सेना का प्रयोग करना चाहते हैं , इसीलिए तो बाली का वध किया इन्होने | वनवास भी नाटक है, अपने राज्य से स्वयं निकलकर आये हैं ये दोनों | सब अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए !” (यहाँ ज्ञात हो की भगवान राम और सुग्रीव ने सिर्फ मित्रता के लिए एक दूसरे की सहायता की, आज तक इनकी मित्रता की मिसालें दी जाती हैं ! परन्तु सुग्रीव ने वचन दिया था, जिसको वे भूलकर सत्ता भोग रहे थे , इसीलिए उनको याद दिलाने लक्ष्मण जी वहां गए थे | सुग्रीव ने वचन ना दिया होता तो भगवान राम अपने पथ पर पूर्ववत अग्रसर रहते और सुग्रीव के भरोसे नहीं बैठे होते |)

शास्त्रों में तथा अनेक कथाओं में हम लक्ष्मण जी के उग्र स्वरुप की ही अक्सर चर्चा करते हैं | परन्तु, भगवान राम के साथ उन्होंने भी महर्षि वशिष्ठ जी से समस्त शास्त्रों का अध्ययन किया था | वानरों को अपने धनुष की टंकार मात्र से ही वह ठीक कर सकते थे परन्तु उनके ज्ञानी व जिज्ञासु मस्तिष्क में यह प्रश्न आया कि वानर ऐसा अनर्गल वार्तालाप कर क्यों रहे हैं ? क्या वे भूल गए कि भगवान श्री राम की सहायता से ही आज सुग्रीव और उसके अनेक साथी वनवास से बाहर आ सके हैं और उनका राज्य खुशहाल है ?  ताड़का, खर-दूषण  आदि, जिनसे भगवान श्री राम ने ही मुक्ति दिलवाई थी, उन सबको ये वानर कैसे भूल गए |  बाली से उसकी मित्रता भी बाली के पराक्रम से उसकी हार के कारण हुयी थी | अन्यथा वह तो बाली से भिड़ंत ही कर रहा था | मूल रूप से एक पूरा का पूरा झूठ कैसे इन वानरों के लिए सच बन गया | और तो और , उनकी कुटिया में  कटी हुई नाकों का संग्रह !  यह माया उन्हें रहस्यमयी लगी|

किष्किन्धा में एक ही ऐसा वानर था जिससे लक्ष्मण जी इस माया के रहस्य को जान सकते थे | यह ध्येय मन में रखते हुए उन्होंने बल बुद्धि के सागर पवनपुत्र हनुमान का स्मरण किया | हनुमान जी तुरंत उनके सामने प्रकट हुए | दोनों ने एक दूसरे को गले लगाया और फिर हालचाल पूछने के बाद लक्ष्मण जी ने कहा ” हे मारुतिनंदन! यहाँ आने के बाद मुझे लग रहा है कि हमें तुरंत भैया राम के पास वापस जाना चाहिए | यहाँ एक अजीब मायाजाल फैला है , जिसके रहस्यों को समझे बिना आगे कोई भी कदम उठाना ठीक नहीं है |” हनुमान जी के चेहरे पर आत्मीयता और सहमति की भावना थी | दोनों तुरंत श्री राम से मिलने चल दिए |

श्री राम के पास पहुंचकर दोनों ने उनके चरण स्पर्श किये | भगवान राम हनुमान जी को इतने दिनों के बाद देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए | लक्ष्मण जी ने किष्किन्धा में चल रहे वार्तालाप को हनुमान जी और श्री राम दोनों को सुनाया | यह सब सुनकर मर्यादा पुरुषोत्तम गंभीर होकर कहते हैं ,

भगवान राम: “हे पवनसुत ! यह कैसी विकट माया ने इन वानरों को घेर रखा है ! मैंने यह तो सुना है की मस्तिष्क में रोग संभव है , जिससे व्यक्ति का दिमाग काम करना बंद कर देता है और वह कुछ भी अनायास हरकतें कर सकता है | याददाश्त का जाना भी संभव है | परन्तु यहाँ तो लगता है कि वानर एक पूरी अलग दुनिया में जी रहे हैं , जहाँ का इतिहास, भूगोल सब कुछ अलग है | वे मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ मालूम पड़ते हैं | कई वैद्य , न्यायाधीश , इंजीनियर जैसे मानसिक रूप से कुशल कार्य भी कर रहे हैं , अपने बाकी सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए वे सभी अच्छे नागरिक हैं | परन्तु ऐसे किष्किन्धा के समझदार वानरों का यह व्यवहार कैसे संभव है ? आप संसार की समस्त विद्याओं में निपुण है, मस्तिष्क के रहस्य और मनोविज्ञान में आपका कोई सानी नहीं है | कृपया हमारी शंकाओं का समाधान करें |”

हनुमान जी (लम्बी आह भरने के पश्चात ) : “हे रघुनन्दन  ! यह सब फेसबुक की माया है !”

लक्ष्मण जी : “फेसबुक ? यह कौन सा नया दानव पैदा हो गया पवनकुमार ?”

हनुमान जी : “यह कोई दानव नहीं है लक्ष्मण भैया ! फेसबुक एक माध्यम है जहां कोई भी कहीं से भी अपने विचार फेसबुक पर सभी के साथ साझा कर सकता है | कोई भी व्यक्ति इन्टरनेट के माध्यम से अपने फ़ोन या कंप्यूटर पर इसका प्रयोग कर सकता है”

भगवान राम : “यह तो बड़ी अच्छी चीज मालूम पड़ती है ! सभी को बिना भेदभाव के ऐसे बराबरी का अधिकार देने से अवश्य समाज में प्रगति होगी | सभी लोग एक दूसरे से अपने अनुभव व ज्ञान बाँट पाएंगे जिससे सभी के ज्ञान में वृद्धि होगी |  वन में रहते रहते लगता है हम इस तकनीक को नहीं जान पाए | कृपया विस्तार से बताएं पवनकुमार |”

हनुमान जी : ” आपने सही कहा प्रभु ,फेसबुक के पीछे का विचार और इसका ध्येय अति उत्तम है | इससे एक प्राणी अनेक प्राणियों के संपर्क में रह सकता है | अब  फेसबुक का लक्ष्य ही देख लीजिये |” यह कहकर हनुमान जी ने तुरंत एक प्रोजेक्टर और  लैपटॉप प्रकट किया और गुफा की अँधेरी दीवार पर फेसबुक का about पेज खोल दिया |
“Founded in 2004, Facebook’s mission is to give people the power to share and make the world more open and connected. People use Facebook to stay connected with friends and family, to discover what’s going on in the world, and to share and express what matters to them.”

लक्ष्मण जी : “अरे वाह ! मतलब अयोध्या के हमारे प्रियजनों को हमारे पीछे पीछे आने की जरूरत ही नहीं थी | वे हमें फेसबुक पर follow कर सकते थे  | अति उत्तम ! भाई भरत को भी अब चिंता करने की आवश्यकता नहीं रहेगी , हम फेसबुक पर  ही chat कर सकेंगे |”

हनुमान जी  “जैसा की आपने देखा लक्ष्मण भैया, यह एक अत्यंत शक्तिशाली माध्यम है | परन्तु जैसा आप जानते हैं दिव्यास्त्र धर्म के लिए चलें तो संसार की प्रगति होती है |परन्तु इतिहास साक्षी है कि अधर्म के लिए भी दिव्यास्त्रों का प्रयोग किया जा सकता है जिससे चारों ओर विनाश ही विनाश फ़ैल सकता है |”

भगवान राम : ” हे मारुतिनंदन ! आप नाहक ही चिंता करते हैं | यह तो मात्र एक समय बिताने का उत्तम साधन लगता है | देखिये इसमें कई खेल भी हैं, अपने मित्रों से बात करने की भी संभावना है , और तो और समाचार भी आपको सिर्फ अपनी news feed से मिल जाता है | सिर्फ फेसबुक खोल लेने से कदाचित इन्टरनेट पर और कुछ करने की आवश्यकता ही न पड़े |”
हनुमान जी : ” हे मर्यादा पुरुषोत्तम ! सर्वज्ञ होते हुए भी आप मानव अवतार की मर्यादानुसार यह न समझने की लीला अवश्य करेंगे | चलिए मैं ही बताता हूँ | आपका समस्त कथन सत्य है , परन्तु किष्किन्धा की वर्तमान विपदा का जड़ भी फेसबुक ही है |”

लक्ष्मण जी : ” वह कैसे हनुमान जी  ? कृपया थोड़े विस्तार से बताएं |”

हनुमान जी : ” हे महावीर लक्ष्मण ! आपने जो भी कथन किष्किन्धा में सुने वह सब फेसबुक के माध्यम से ही वानर जनों के बीच पहुंचाए गए थे | Open medium होना जहाँ फेसबुक की शक्ति है , वहीँ उसकी कमजोरी भी है | कोई भी कुछ भी प्रसारित कर सकता है |”

भगवान राम : “हे अंजनीकुमार ! यह तो हमें कोई बुरी बात नहीं लगती | अयोध्या में सबको अभिव्यक्ति की आजादी है, यदि कोई हिंसा अथवा प्राणघातक कथन नहीं कर रहा तो उसके अवश्य कहने की स्वतंत्रता होनी चाहिए | परन्तु जो भी यह सूचना देखेगा वह अपनी स्वयं की धारणाएं बना सकता है | उसके इतिहास, शिक्षा का इसमें अहम योगदान होगा और जैसी अफवाहें  भाई लक्ष्मण बता रहे थे, वैसी बेसिरपैर की बातों पर किष्किन्धा के ज्ञानीजन कैसे विश्वास कर सकते हैं ?”

हनुमान जी : ” हे प्रजावत्सल  ! आपने सही कहा | पर  मैं अब आपको मनोविज्ञान के कुछ तथ्यों के बाते में बताता हूँ , जो आपको अवश्य ज्ञात है , पर आप अपने इस भक्त से सुनना चाहते हैं |

हे मुनि ! जैसा की आपने ठीक पहचाना कि सोशल मीडिया पर सभी चीजें सत्य नहीं होंगी , परन्तु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत इसको चुनौती नहीं देनी चाहिए | प्राणी स्वयं सही गलत देख सकता है | बस यहीं आप अपनी सृष्टि की माया को कमतर अंक रहे हैं !

मस्तिष्क एक जटिल उपकरण है | इसके दो मुख्य भाग हैं : चेतन मस्तिष्क (conscious) और अवचेतन मस्तिष्क (subconscious mind) | | चेतन मस्तिष्क हमारी पहुँच में होता है और हमारे सभी निर्णय यहीं से आते हैं | अवचेतन मस्तिष्क एक भीतरी सतह है , जो हमारी दैनिक पहुँच से बाहर है | परन्तु यह हमारे चेतन मस्तिष्क को अवश्य प्रभावित करता है | यदि अवचेतन मस्तिष्क हमारी पहुँच में होता तो हम सब झाड़ू लेकर वहाँ स्वच्छता अभियान चला देते और प्रत्येक प्राणी मुनि होता | परन्तु, जैसी आपकी माया है, अवचेतन मस्तिष्क का निर्माण हमारे ही रहन सहन व भूतकाल के संस्कारों से होता है |”

लक्ष्मण जी : ” हे कपिश्रेष्ठ ! हमारा रहन सहन व भूतकाल तो हमारे चेतन मस्तिष्क से निर्धारित होते हैं , क्या इसका मतलब हमारा चेतन मस्तिष्क समय के साथ हमारे अवचेतन मस्तिष्क का निर्माण करता है ?”

हनुमान जी : “बिलकुल सही लक्ष्मण भैया ! यह एक चक्र है , मस्तिष्क को एक अथाह सागर मानें तो सतह की लहरें चेतन मस्तिष्क हैं | सतह की लहरें भीतर की गहराइयों से आती हैं , परन्तु यही सतह की लहरें सागर में वापस समाकर उसकी गहराइयों को भी प्रभावित करती हैं |”

भगवान राम : “वह तो ठीक है पवनकुमार | उपनिषदों में इस विषय पर काफी चर्चा हुयी है | परन्तु इसका सोशल मीडिया से क्या सम्बन्ध ?”

हनुमान जी : ” हे प्रभु , फेसबुक एक लाभार्थी  कंपनी है | इनका प्रमुख उद्देश्य लाभ कमाना है |”

लक्ष्मण जी (सम्मानपूर्वक मुस्कराते हुए ): ” सभी आपकी तरह निस्स्वार्थ भाव से सेवा नहीं कर सकते हनुमान जी ! गृहस्थ व्यक्ति के लिए धन आवश्यक है | धन कमाने में कोई हानि तो नहीं ! जो सेवा दे रहा है उसे लाभ मिलना ही चाहिए |”

हनुमान जी : “बिलकुल लक्ष्मण भैया | परन्तु ऐसी कंपनियों की आय का मुख्य स्रोत विज्ञापन हैं | अर्थात जितना समय आप फेसबुक पर बिताएंगे , उतने ही अधिक विज्ञापन आप देखेंगे और उतना ही इनको अधिक लाभ होगा | इस लाभ को बढाने के लिए वे आपका ध्यान आकर्षित करना चाहेंगी वह भी अधिक से अधिक समय के लिए | इसके लिए आप जिस प्रकार की चीजें कभी देखते हैं , जैसे links पर क्लिक करते हैं ; आपको लुभाने के लिए वैसी ही चीजें बार बार आपकी news feed में प्रदर्शित की जाती हैं और वैसे ही विज्ञापन आपको दिखाए जाते हैं | ”

भगवान राम (गंभीर मुद्रा में भौंहें सिकोड़ते हुए ): “हम्म | यहाँ से हमें यह प्रतीत हो रहा है की हमारे चेतन मस्तिष्क की सहायता से हमारे अवचेतन मस्तिष्क में जाने का रास्ता बनाया जा रहा है ! यह एक चिंतनीय बात तो है , परन्तु किष्किन्धा में फैली अफवाहों का क्या ?”

हनुमान जी : “वहीँ आ रहा हूँ प्रभु ! अब आप यह तो जान गए की news feed आश्चर्यजनक स्तर तक आपको संसार के सिर्फ एक पहलू तक सीमित रखने में सक्षम है |अब बारी आती है फेसबुक पर चलाये जा सकने वाले सुनियोजित अभियानों की | फेसबुक पर किसी पेज की सहायता से उस पेज को like किये सभी लोगों तक कोई भी सूचना पहुंचाई जा सकती है |  इससे बहुत अच्छे काम भी होते हैं , जैसे अयोध्या के भव्य शिल्पों का पेज, महर्षि वशिष्ठ का वेदान्त पेज आदि जो बहुमूल्य जानकारी देते हैं | परन्तु इसका दुरूपयोग आसान है | यदि किसी  पेज पर कोई झूठी खबर आ रही है, तो वह भी कई लोगों तक जाएगी | अगर आपने पेज को like न भी किया हो, तब भी यदि सुनियोजित तरीके से कोई संगठन किसी खबर को बार बार like और share करवा  रहा हो तो वह आपके किसी दूर के मित्र के सहारे आप  तक पहुँच सकती है |”

भगवान राम : “परन्तु कोई भी अतार्किक बात वहीँ दबकर न रह जाएगी ? कोई साधारण प्राणी भला एक मिथ्या वचन पर कैसे आसानी से भरोसा कर लेगा ?”

हनुमान जी : “हे करुणानिधान ! यह बात कहते मुझे कष्ट तो होता है , परन्तु मस्तिष्क की बनावट ही ऐसी है की यदि कोई जानकारी उसको बार बार दिखाई जाये , तो उसपर लोगों का विश्वास धीरे धीरे बनने  लगता है | माता कैकेयी का आपके लिए स्नेह सर्वविदित है , परन्तु फिर भी मंथरा के बार बार कहने पर उनका मन बदल ही गया ! सोशल मीडिया पर किसी भी विषय की बहुतायत से  उनका ध्यान जिज्ञासावश जाता ही है | लोग उस विषय पर और जानकारी चाहते हैं | परन्तु जैसा मैंने पहले ही कहा की उनकी news feed पहले से ही असंतुलित हो सकती है और एक योजनाबद्ध तरीके से किया जाये तो आप सिर्फ वही देख पाएंगे जो की दिखाया जा रहा है ! यही सोशल मीडिया की माया है  !”

लक्ष्मण जी : “समझा ! बार बार प्रहार करने से  अवचेतन मस्तिष्क का रास्ता  खुल ही जाता है |”

हनुमान जी : “यह आपने बहुत सटीक बात कही लक्ष्मण भैया  ! अवचेतन मस्तिष्क चेतन मस्तिष्क की तरह तर्कों आदि की भाषा उतनी नहीं समझता जितनी कि चित्रों आदि की | एक विषय से जुड़े फोटो आपको दिखाए जायें जिनमें एक ही मुद्रा में खड़े लोग एक ही बात बार बार कह रहे हों, तो आप धीरे धीरे उसे सत्य मानने ही लगेंगे | आपको लगेगा कि बिना चिंगारी के तो धुंआ नहीं उठ रहा ! किसी जानकारी की अत्यधिक उपलब्धता उसकी सत्य की परख को असंतुलित बना सकती है | मनोवज्ञान की भाषा में इसे “availability bias” अर्थात  उपलब्धता पूर्वाग्रह कहते  हैं | उदाहरण स्वरूप लोगों को भूकंप अथवा बाढ़ अथवा किसी आतंकवादी हमले की संभावना वास्तविक संभावना से अधिक लगाती है क्योंकि समाचारों में ऐसी घटनाएं बहुत विस्तार से और अक्सर बताई जाती हैं , जबकि रास्ते पर चलते हुए दुर्घटना कहीं अधिक संभावित है , परन्तु लोग राह चलते इसके बारे में नहीं सोचते !

दानव फेसबुक में वानरों से कहीं तेज थे | उन्होंने रावण की सौम्य मुद्रा में मुस्कराती तस्वीरों के साथ वेदों से चुराए सुविचार लिखने शुरू कर दिए | इन तस्वीरों को कई बार like और share करवाया गया | कहीं रावण श्वेत वस्त्र धारण किये विश्वशांति की बात कर रहा है, कहीं गेरुए वस्त्रों में शिवजी की पूजा कर रहा है | सभी जानते हैं की रावण परम शिवभक्त है , अब एक सच के साथ  कई घातक असत्य कई बार, प्रतिदिन आपके सामने आयें तो धीरे धीरे विश्वास बनाने ही लगता है | फिर रावण से आपके बैर की बात फैलाई गयी | लोग रावण को पसंद करने ही लगे थे ; आपको उसका प्रतिद्वंद्वी बताकर आपके व आपके समर्थकों के लिए नफरत फैलाना आसान काम था |फोटोशॉप की गयी तस्वीरों के साथ कई अनर्गल आरोप आपके भक्तों पर लगाये गए | रोज़ देखते देखते वानरों में यह धारणाएं भी घर करती गयीं |

भगवान राम : “हे केसरीनंदन ! यह बात तो समझ आ गयी की यह अफवाहें किष्किन्धावासियों तक पहुँचीं कैसे | परन्तु आप जैसे महाज्ञानी लोगों के रहते इसका प्रतिकार क्यों नहीं हुआ ? क्या आप सोशल मीडिया पर अपनी बात उतने ही बल से नहीं रख सकते ?”

हनुमान जी (आंखें बंदकर लम्बी आह भरते हुए ) : “अव्वल तो प्रभु मैंने फेसबुक का उतना प्रयोग किया नहीं | जबतक मुझे इस फैलते रोग का पता चलता, तब तक बहुत देर हो चुकी थी | मैंने प्रयास  तो बहुत किये , परन्तु फेसबुक की यह माया मनोविज्ञान के नियमों के कारण और शक्तिशाली हो जाती है | मनोविज्ञान की भाषा में सत्य की परख के लिए परम हानिकारक और कदाचित सबसे खतरनाक असंतुलन है “confimation bias” अर्थात सहमति पूर्वाग्रह | जो सूचना हमारे विचारों से मेल खाती है , वह हमें तुलनात्मक अधिक सही लगेगी  !

लक्ष्मण जी (मुस्कराते हुए ) : ” हे जितेन्द्रिय , यह तो कोई नयी बात नहीं हुई ! हम सभी अक्सर वही सुनना चाहते हैं जो हमें अच्छा लगे |”

भगवान राम : ” अच्छा लगना और बात है वीर लक्ष्मण ! किन्तु सत्य और असत्य के बीच अगर हमारी पसंद आ जाये तो यह खतरनाक हो सकता है |
सत्यं ब्रूयात् , प्रियं ब्रूयात् | न ब्रूयात सत्यं अप्रियं ||
प्रियं च नानृतं ब्रूयात्  | एषः धर्मः सनातनः ||
अर्थात सत्य बोलो , प्रिय बोलो परन्तु जो सत्य अप्रिय लगे वो न बोलो | अगली पंक्ति महत्त्वपूर्ण है , प्रिय हो किन्तु अनृत अर्थात असत्य हो , वह मत बोलो, यही सनातन,अर्थात सभी का धर्म है | ”

हनुमान जी : “बिलकुल ठीक हे ज्ञानउदधि ! Availability bias असत्य के बीज बोती है और confirmation bias उसे फेसबुक के पूर्वाग्रहित news feed के खाद और पानी  सींच सींच कर बड़ा करती है | सत्य के मेरे जैसे प्रहार इस फले फूले असत्य के वृक्ष को इसी confirmation bias के कारण अधिक नहीं हिला पाते | और तो और प्रभु आधुनिक मनोविज्ञान ने शोध में इससे भी खतरनाक और आश्चर्यजनक बात पाई है !”

लक्षमण जी : “हे मारुतिनंदन ! स्थिति तो पहले ही चिंतनीय है, और इससे अधिक क्या बुरा हो सकता है ?”

हनुमान जी : ” “backfire effect”  अर्थात प्रतिकार-प्रभाव लक्ष्मण भैया ! यदि किसी ने किसी धारणा को बहुत गहराई से मन में उतार लिया है , तो यदि आप उसके सामने उस धारणा से विपरीत तथ्य प्रस्तुत करेंगे तो उसकी धारणा और मज़बूत हो जाती है ! उन्हें लगता है की जो तथ्य आप रख रहे हैं , उसमें अवश्य कोई षड़यंत्र है | अवश्य ये तथ्य उनको मूर्ख बनाने के लिए गढ़े गए हैं ! मूल रूप से हमारा दिमाग इसे अपनी धारणाओं पर आक्रमण समझता है, और तुरंत या तो आक्रामक हो जाता है या अपनी धारणाओं के इर्द गिर्द एक कवच बनाकर सभी तथ्यों को दरकिनार कर देता है |”

भगवान राम (गंभीर मुद्रा में ) : “सत्यमेव जयते के लिए कठिन समय है यह | अवश्य इस backfire effect में confirmation bias और availability bias का योगदान रहता होगा |”

हनुमान जी : “बिलकुल सही हे रघुकुलतिलक ! सभी के साथ ऐसा होना संभव है | इसीलिए कई बार अत्यधिक समझदार लोग भी इस दुश्चक्र से नहीं बच पाते | जब सामाजिक जीवन में महत्त्वपूर्ण लोग ऐसी घटनाओं को like या share करते हैं तो इसके दुष्परिणाम अधिक होते हैं क्योंकि आमजन उनपे विश्वास करते हैं और confirmation bias और मज़बूत होता है |

लक्ष्मण जी : “हे केसरीनंदन ! मेरे मन में एक शंका और है | कितना भी “backfire effect” क्यों न हो , सत्य तथ्यों के लगातार प्रहार से यह घेरा कभी तो टूटना चाहिए | मस्तिष्क में कितने भी पूर्वाग्रह क्यों न हों, यह मानना मुश्किल है की पर्याप्त अध्ययन के बाद भी लोग अपनी धारणाएं नहीं बदलेंगे |”

हनुमान जी : “आपने स्वयं अपने प्रश्न का उत्तर दे दिया लक्ष्मण भैया | पर्याप्त अध्ययन और बार बार प्रश्न करने से कदाचित सत्य सामने आये | पर फेसबुक की माया का एक और प्रभाव यह है कि वह किसी भी व्यक्ति के attention span अर्थात एकाग्रचित्त रह सकने के समय को बहुत कम कर देती है | आप कोई भी news feed उठा के देख लीजिये , इसमें आपके किसी मित्र का जन्मदिन है , कोई मित्र कहीं घूमने गया है, किसी महान व्यक्ति का निधन या पुण्यतिथि है, किसी राजनेता का कोई बयान आया है, आपके प्रिय खेल के बारे में खबर है, कुछ कविता कहीं लिखी गयी है | सुनने में यह सब लगता है की मानों एक गुलदस्ते की तरह सभी प्रकार की खबरें आपको मिल रही हैं, जोकि आपके लिए बहुत कारगारी है |परन्तु शायद 15 सेकंड में आपको 10 से अधिक अलग अलग विषयों से जुडी सूचना मिल रही है | कम समय के लिए किसी भी सूचना के संपर्क में रहने से और विषय के एक क्षण से भी कम में बदल जाने से आपकी एकाग्र होकर किसी भी सूचना के बारे में सोचने और पर्याप्त अध्ययन करने की शक्ति धीरे धीरे क्षीण हो सकती है ! जब आपको सिर्फ सुर्ख़ियों में और मनभावन चित्रों में ही संसार का ज्ञान मिल रहा हो तो आप गहराई से अध्ययन किये बिना ही स्वयं को परमज्ञानी समझने लगेंगे और गहराई में जाने का प्रयास ही नहीं करेंगे |  ”

भगवान राम : “हम्म…..समस्या तो गंभीर जान पड़ती है | परन्तु यदि सत्य की परख पर इसके इतने हानिकारक प्रभाव हो सकते हैं तो लोग इसका प्रयोग कम क्यों नहीं करते ?”

हनुमान जी : ” हे रघुवीर ! फेसबुक की आसक्ति या लत भी लग सकती है |

लक्ष्मण जी (आश्चर्य से ): “यह कैसे संभव है पवनकुमार ? आसक्ति या लत तो किसी नशीले पदार्थ के सेवन से लगती है |”

हनुमान जी : ” लक्ष्मण भैया, प्राणी जब भी किसी नयी चीज की इच्छा या तलब करता है तो उसका शरीर dopamine नामक एक रसायन बनाता है जो की एक neurotransmitter अर्थात मस्तिष्क से संपर्क करने वाला रसायन है | Dopamine इच्छा से पैदा होने वाली उत्तेजना के लिए ईंधन है और प्राणी के शरीर को  उस इच्छा को  पूरा करने के लिए तैयार करता है |  Dopamine हमारे जीवन के लिए परम आवश्यक है| भोजन, निद्रा आदि की इच्छा भी dopamine को क्रियाशील करती है, जिससे हम अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा कर पाते हैं | Dopamine से एक विशेष सुख की अनुभूति होती है जो हमें तनाव व निराशा से दूर रखती है |

परन्तु dopamine की अत्यधिक लत घातक हो सकती है ! चूहों पर किये गए शोध से यहाँ तक देखा गया है की यदि चूहों को एक बटन दबाने से dopamine मिलता है तो वे तब तक भूख प्यास भूलकर तब तक उस बटन दबाते रहते हैं जब तक वे बेहोश नहीं हो जाते ! फेसबुक पर पल प्रतिपल नयी सूचनाओं की झड़ी, like,comment आदि की आशा एक नयी प्रकार की सूचना की इच्छा का एक विपुल सागर प्रस्तुत करती है |  इन्टरनेट के माध्यम से इस इच्छा को पूरा करना और भी आसान हो गया है | बार बार इस चक्र में लगे रहने से  उसी सुख की अनुभूति के लिए अगली बार और भी अधिक dopamine की आवश्यकता होती  है |  फेसबुक अत्यधिक  dopamine की लत  लगा सकती है  | आजकल इसी के कारण अधिकतर वानर अपने परिवार अथवा मित्रों के साथ रहने पर भी बार बार अपने फ़ोन की तरफ देखते रहते हैं , यह नयी सूचना  की इच्छा को सुलगाने वाले अत्यधिक क्रियाशील dopamine का परिणाम है | चाहकर भी इस इच्छा या तलब  को  कम करना या त्यागना dopamine का आदि हो जाने पर कठिन है | ”

लक्ष्मण जी : “अर्थात आसक्ति  इच्छुक  मनोस्थिति से बनने वाले dopamine की होती है | ”

हनुमान जी : ” एकदम सही लक्ष्मण भैया ! इसीलिए कोई इन्टरनेट पर किसी दो घड़ी के काम से भी जाता है , तो संभव है की वह वास्तविकता में कई घंटे वहाँ बिता दे ! यह dopamine का ही प्रभाव है |”

भगवान राम : “हे संकटमोचन ! आपके लिए कुछ भी असंभव नहीं | इस जटिल समस्या का कोई हल भी तो बताइए !”

हनुमान जी : ” हे करुणानिधान ! जैसा की आपने सर्वप्रथम सही कहा था कि फेसबुक एक बहुत अच्छा माध्यम है | इसके उपयोग में कोई बुराई नहीं , अपितु इससे कई लाभ संभव हैं | परन्तु किसी भी आविष्कार का दुरुपयोग संभव है | जैसे किसी साधारण खेल के उपकरण को भी यदि ठीक से नहीं समझा गया तो उससे चोट लगने की काफी संभावना है, उसी प्रकार फेसबुक की सीमाओं, ध्येय व उपयोगिता को समझना आवश्यक है | अब मैंने जो जो समस्याएं बतायीं उनके संभव समाधान सुझाता हूँ:

  • Availability bias को विफल करने के लिए किसी भी विश्वसनीय सूचना के लिए किसी ऐसे स्रोत का प्रयोग करना चाहिए  जोकि इन्टरनेट प्रयोग का  इतिहास ना रखता हो |आजकल बिना विज्ञापन वाले माध्यमों का मिलना मुश्किल है, परन्तु फिर भी अपनी सूचना के स्रोत को हमेशा सत्य की कसौटी पर जांचते रहना चाहिए  और यदि सूचना महत्त्वपूर्ण है तो कई भिन्न प्रकार के स्रोतों का प्रयोग करना चाहिए | गूगल का प्रयोग एक नियम की तरह किसी भी सूचना को जांचने के लिए अवश्य करना चाहिए  | परन्तु गूगल भी इन्टरनेट का हिस्सा है और availiability bias से अछूता नहीं रह सकता| साथ ही गूगल भी आपके इन्टरनेट के इतिहास की जानकारी का प्रयोग करता है, इसलिए यहाँ भी चौकन्ना रहना चाहिए |
  • Confirmation bias को विफल करने के लिए  जानबूझकर अपने से भिन्न विचार को ध्यानपूर्वक परखना चाहिए  | अपने से भिन्न विचार के मित्रों से साथ चर्चा करनी चाहिए और वाद विवाद का एक स्वस्थ वातावरण बनाये रखना चाहिए  | जो स्रोत सिर्फ एक पक्ष की ही सूचना दें, उनसे सावधान रहना चाहिए | फेसबुक पर तो नाम से ही पता चल जाता है जैसे “Ravan for Peace”, “Truth of Ram” आदि, इनसे बचकर ही रहना चाहिए |
  • Backfire effect को विफल करने के लिए  availability bias व confirmation bias से बचना चाहिए | किसी भी सूचना की गहराई में जाने का धैर्य रखना चाहिए | अपने आपको किसी विचारधारा अथवा व्यक्ति से भावनात्मक रूप से नहीं जोड़ना चाहिए | तर्कशक्ति को सूचना की परख के लिए सर्वोपरि मानना चाहिए , न की क्रोध, दुःख  अथवा भय जैसी भावनाओं को, क्योंकि यह सब मस्तिष्क के उस हिस्से से उत्पन्न होने वाले विचार हैं जो भाषा व तर्क को नहीं समझता |
  • attention span की समस्या से निजात पाने के लिए लम्बे लेख पढ़ने का प्रयास करना चाहिए  | कंप्यूटर से कुछ समय दूर रहकर पुस्तक पढना भी लाभकारी है |
  • dopamine की आसक्ति अथवा लत से बचने के लिए नियमित ध्यान का अभ्यास करना चाहिए  | यह attention span के लिए भी अत्यंत कारगरी है | फेसबुक जैसे  dopamine के प्रचंड साधनों का उपयोग सीमित रखना चाहिए कयोंकि जैसा मैंने बताया , इनसे कई हानियाँ संभव हैं | शारीरिक व्यायाम से भी शरीर में dopamine का स्तर संतुलित रहता है और यह शरीर के साथ साथ मानसिक स्वास्थ्य लिए लाभकारी भी है |

भगवन् ! जिस प्रकार संसार रुपी माया में रहकर भी प्राणी सभी प्रकार के भोग करते हुए , यदि अपने मस्तिष्क का प्रयोग करे व संयम से काम ले तो वह धर्म, अर्थ काम और मोक्ष को प्राप्त कर सकता है ; उसी प्रकार फेसबुक को भी अपना शत्रु समझे बिना उसका सही प्रयोग करके उसके सभी लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं और उसके दुष्परिणामों से बचा जा सकता है |”

भगवान राम ” हे संकटहरण हनुमान ! आपके इन तर्कों से हमें संतोष हुआ | हमें पूर्ण विश्वास है की आप अंगद, नल, नील  आदि विद्वान वानरों के साथ कुछ ही समय में किष्किन्धा से इन अफवाहों को समाप्त कर देंगे | “

हनुमान जी ” आपके आशीर्वाद से यह अवश्य संभव होगा प्रभु | अब आज्ञा दीजिये , जाकर पुस्तकालयों का निरीक्षण करना है | विज्ञान के सिद्धांतों के प्रदर्शन के लिए एक जन प्रयोगशाला बनवाने के बारे में  नल और नील से चर्चा करनी है | कुमार अंगद के बनवाए अखाड़ों के लिए व्यायाम के उपकरण भी तैयार करवाने हैं | हम सभी कई प्रकार के प्रयास कर रहे हैं, आपकी कृपा से हमारी विजय अवश्य होगी | जय श्री राम !”

यह कहकर हनुमान जी ने विदा ली | समय के साथ बजरंग बली ने किष्किन्धा से सभी अफवाहों का अंत किया तथा सभी वानर उनके दिखाए मार्ग पर चलकर बल बुद्धि में श्रेष्ठ सिद्ध हुए | उन सभी ने मिलकर सीता माता को खोज निकाला| कालांतर में प्रभु श्री राम और महाबली लक्ष्मण ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई की और आततायी रावण का अंत करके धर्म की स्थापना की | इससे उन्होंने अपने कर्मों द्वारा सिद्ध किया : सत्यमेव जयते |

लेखक : सभी घटनाएं काल्पनिक हैं | कई प्रकार के प्रमाणित शोध अथवा मनोविज्ञान के प्रचलित विचारों को इस कहानी के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का यह एक लघु प्रयास है | लेखक स्वयं फेसबुक का प्रचुर प्रयोग करता है ! इस लेख पर मंथन के लिए आप सभी का स्वागत है |

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One thought on ““हे रघुनन्दन ! यह सब फेसबुक की माया है !”

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