न्यूनतम तापमान की खोज : गैसों के द्रवीकरण की गाथा (Audio Available)

(यह लेख सुनने के लिए भी उपलब्ध है , कुल समय : 10 min 49 sec )

जिस कंप्यूटर या फ़ोन पर आप अभी इस लेख को देख रहे हैं , वह विज्ञान के जिन सिद्धांतों आधारित है . उसके रहस्यों को समझने के लिए low temperature यानी कि बहुत कम तापमान पर किये गए प्रयोग आवश्यक थे | आप पूछेंगे वह कैसे भला ? आज से कुछ डेढ़ हज़ार साल पहले, भारतीय दार्शनिक/वैज्ञानिक महर्षि कणाद ने  अणु अर्थात atom की परिकल्पना की | किसी भी वस्तु को छोटे-छोटे भागों में बाँटते जायेंगे, तो एक समय के बाद उसको बांटना संभव नहीं रहेगा | यह सबसे छोटी इकाई atom है | आज हम जानते हैं की atom का पूरा भार लगभग उसके केंद्र में होता है जिसको nucleus कहते हैं और बहुत ही हलके कण जिनको electron कहते हैं , उसके इर्द गिर्द घूमते रहते हैं  | कोई भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण करंट यानी electrons के प्रवाह पर ही काम करता है |मतलब electrons को बेहतर समझकर ही हम इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बेहतर बना सकते हैं और नए उपकरणों का अविष्कार कर सकते हैं | पर इसमें एक बहुत बड़ी समस्या आती है ! हमारे आस पास का जो तापमान है, उस तापमान पर atoms हमेशा हिलते-डुलते-कांपते रहते हैं | atoms का यह नृत्य हम नंगी आँखों से नहीं देख सकते, पर अधिक तापमान पर यह देखा जा सकता है | आपने कभी भी मोम या बर्फ को गर्मी से पिघलते देखा है ?  यह atoms के इसी नृत्य के बेकाबू हो जाने का परिणाम है | गर्मी पाकर ये atoms और ज्यादा कांपते हैं और एक सीमा के बाद एक दूसरे से इतने दूर हो जाते हैं की ठोस से द्रव यानी solid से liquid हो जाते हैं | नए नए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने के लिए इन electrons को समझना आवश्यक है, पर हमारे आस पास के तापमान पर नाचते हुए atoms के साथ इनका अध्ययन करना वैसे ही मुश्किल है जैसे मदमस्त नाचते हाथियों के समूह में चीटियों के समूह की चाल देखना  | इसीलिए तापमान कम करके, atoms का नाचना एकदम धीमा करके ही हम electrons को बेहतर समझ सकते हैं |

अब आप यह तो मान गए होंगे कि कम तापमान पैदा करना विज्ञान और तकनीकी के लिए कितना आवश्यक है | विज्ञान को नयी दिशा देने वाली यह असाधारण गाथा विज्ञान के महानायक Michael Faraday के साथ शुरू होती है| अब Faraday का नाम आया है तो उनके बारे में दो शब्द कहना ज़रूरी है ! Michael Faraday एक साधारण सी जिल्दसाजी, यानी book binding की दुकान में सहायक थे | उनकी स्कूली शिक्षा बहुत मामूली थी | पर विज्ञान के प्रति अपने आकर्षण से उन्होनें स्वयं को खुद किताबें पढ़ पढ़कर शिक्षित किया | England की Royal Society के प्रसिद्ध रसायनशास्त्री Humphrey Davy के public lectures को attend करके Faraday ने  Davy को उनके lectures के notes एक सुन्दर किताब के रूप में bind करके भेंट किये | Davy ने खुश होकर Faraday को अपना सहायक बना लिया | परन्तु बाद में वे और उनकी पत्नी Faraday के साथ एक नौकर जैसे ही पेश आते रहे | इसके बावजूद Faraday  उनके प्रति सदा कृतज्ञ रहे और विज्ञान में अपने परिश्रम से प्रगति लाते रहे | अगर आपके घर में बिजली आती है तो Faraday का धन्यवाद कीजिये, क्योंकि उन्होंने ही generator का सिद्धांत दिया | गर्मी में पंखे या कूलर की हवा का आनंद लेते हुए भी Faraday का धन्यवाद कीजिये क्योंकि motor और generator एक ही सिक्के के दो पहलू हैं , जिसे Faraday ने ही पहले समझा था | और भी कई अनगिनत वरदान Faraday की देन  हैं | एक महान वैज्ञानिक होने के साथ वे एक बहुत अच्छे इंसान भी थे | उन्होनें सर की उपाधि विनम्रता से अस्वीकार कर दी क्योंकि वे पुरुस्कार की आशा से विज्ञान की सेवा नहीं करते थे | Faraday कई वैज्ञानिकों के लिए आदर्श हैं, उनको हमारा शत शत नमन | खैर अपनी कहानी को आगे बढ़ाते हैं :

एक समय Faraday Chlorine नाम के तत्त्व के किसी रसायन के साथ प्रयोग कर रहे थे | Chlorine साधारण तापमान पर एक गैस है, पर chlorine से बना यह रसायन ठोस यानी solid था | बिलकुल वैसे ही  जैसे पानी साफ़ करने वाला ब्लीचिंग पाउडर होता तो ठोस है, पर उसमें भी chlorine होती है, जिसकी महक से आप शायद परिचित हैं ! एक दिन Faraday शीशे के एक सीलबंद बर्तन में उस रसायन को गर्म कर रहे थे  | थोड़ी देर बाद वे पाते हैं कि, शीशे के बर्तन में एक पीले रंग का liquid यानी द्रव इकठ्ठा होता जा रहा है | बाद के प्रयोगों से उन्होंने यह प्रमाणित किया की यह द्रव वास्तव में Chlorine थी | पहली बार एक तत्त्व को, जो गैस के रूप में पाया जाता था , liquid यानी द्रव  के रूप में परिवर्तित किया गया ! किसी भी गैस को द्रव बनाने के लिए उसको उसके boiling point तक ठंडा करना आवश्यक है | Chlorine का boiling point साधारण अवस्था में शून्य से 34 डिग्री सेल्सियस नीचे है | Faraday ने अपनी प्रयोगशाला के तापमान पर, जोकि शून्य से बहुत कम नहीं रहा होगा , यह कैसे संभव किया ? यह संभव हुआ दबाव यानी Pressure के कारण | आपने घरों में प्रेशर कुकर का प्रयोग किया होगा| प्रेशर कुकर में खाना जल्दी इसलिए बन जाता है क्योंकि सीलबंद कुकर में पानी के ऊपर दबाव बनता है  |किसी भी चीज पर यदि दबाव डाला जाये  तो उसका boiling point  बढ़ जाता है, मतलब जो पानी पहले 100 डिग्री सेल्सियस पर उबलता था वह अब 120 डिग्री पर उबलेगा, यानी द्रव से गैस बनेगा | इसका मतलब प्रेशर कुकर का पानी, साधारण खुले बर्तन के पानी से अधिक गर्म होता है | इसी कारण प्रेशर कुकर में  खाना जल्दी पक जाता है |  ठीक इसी प्रकार जब Faraday रसायन को गर्म कर रहे थे तो उससे निकली chlorine गैस उस सीलबंद शीशे के बर्तन में pressure यानी दबाव बढाती गयी, और उसका boiling point, -34 डिग्री सेल्सियस से बढ़ते बढ़ते Faraday की प्रयोगशाला के तापमान तक आ पहुंचा, और chlorine गैस से द्रव बन गयी ! Faraday इस तकनीक से sulfur dioxide, nitrogen dioxide, hydrogen sulfide आदि अनेक गैसों का द्रवीकरण करने में , यानी और कम तापमान तक जाने में सफल हुए |  परन्तु कुछ गैसें ऐसी थीं जो इस तकनीक से द्रव नहीं बन पा रहीं थीं , जैसे oxygen, nitrogen, hydrogen आदि | ऐसा इसलिए था क्योंकि इन गैसों के boiling point को प्रयोगशाला में संभव तापमान तक बढाने के लिए जितना दबाव चाहिए था, वह Faraday जैसे तरीके से संभव नहीं हो पा रहा था |

यहाँ Cailletet नाम के एक वैज्ञानिक ने इस खोज को आगे बढाया | Cailletet के पिताजी की लोहे की फैक्ट्री थी | उन्होंने वहीँ अपनी प्रयोगशाला बनायी | शुरू में वे acetylene नाम की एक गैस को द्रव बनाने का प्रयास कर रहे थे | उन्होंने भी Faraday की तरह एक सीलबंद बर्तन लिया और उस बर्तन में वे गैस का दबाव बढ़ाते गए | पर अधिक दबाव से उनके बर्तन में एक छोटा सा छेद हो गया | उन्होंने पाया की अत्यधिक दबाव में भरी गैस जब उस छोटे से छेद से निकल रही थी, तो वहां द्रव की छोटी छोटी बूँदें कोहरे की तरह जमा होती जा रही थीं ! पहले तो उनको लगा की शायद उनकी गैस ही अशुद्ध है | पर बार बार गैस की शुद्धता को परखकर यह प्रयोग दोहराने पर उनको विश्वास हो गया कि अधिक दबाव से कम दबाव की और फैलने से ठण्ड पैदा होती है और यह गैसों के द्रवीकरण में सक्षम है | आज हम जानते है कि ऐसा Joule-Thomson effect के कारण होता है , यह सभी तापमान पर सभी गैसों के लिए काम नहीं करता, पर जिनके लिए भी करता है, उनके लिए एक बहुत शक्तिशाली माध्यम है | इस तरकीब से Cailletet oxygen और बाद में  nitrogen को भी द्रव बनने में सफ़ल हुए | (हालांकि Cailletet सिर्फ़ कोहरे जैसे बूँदें  ही बना पाए थे | उनकी इस तरकीब पर और शोध करके और वैज्ञानिकों ने अंततः oxygen और nitrogen की भरपूर मात्र बनाने में सफलता पायी )  Cailletet के साथ साथ एक और वैज्ञानिक Pictet  ने भी उसी समय oxygen को द्रव बनाने का एक दूसरा तरीका निकाला था | उनकी तरकीब में कई गैसों को क्रमवार ठंडा किया जाता था | कम boiling point वाली गैस को ठंडा करने के लिए अधिक boiling point वाली किसी दूसरी गैस से बने द्रव का प्रयोग किया जाता था, जिसको द्रव बनाने के लिए उससे अधिक boiling point वाली किसी  तीसरी गैस के द्रव का प्रयोग किया जाता था ….ऐसे ही क्रमवार एक के बाद एक अलग अलग गैसों को ठंडा किया जा सकता था | बाद में जर्मन वैज्ञानिक Linde, ( डीजल इंजन के जनक Rudolf Diesel के इन्हीं के छात्र थे ) ने एक ऐसा चक्र बनाया जिससे यह ठंडा करने की प्रक्रिया लगातार चलती रहे | इस चक्र में  पहले  गैसों पर दबाव बनाया जाता है | फिर उनको अधिक दबाव वाले क्षेत्र से कम दबाव वाले क्षेत्र में फैलाया जाता है | इससे ठण्ड पैदा होती है और गैस द्रव में बदलने की प्रक्रिया का आरम्भ होता है | जो भी गैस द्रव नहीं बनी, उसको वापस अधिक दबाव वाले क्षेत्र में भेज दिया जाता है और वही चक्र फिर से चलता रहता  है | इस प्रकार बहुत कम तापमान तक जाना संभव हो सका | यह प्रक्रिया हमारे जीवन के लिए एक बड़ा वरदान साबित हुई | द्रव के रूप में oxygen, अस्पतालों में  जान बचाने वाले cylinder  के रूप में काम आता है | nitrogen को द्रव के रूप में भोजन सामग्री को freeze करके खाद्य  संरक्षण में प्रयोग किया जाता है |

आगे चलकर, James Dewar ने शून्य से 252 डिग्री सेल्सियस नीचे जाकर hydrogen को द्रवित करने में सफलता प्राप्त की | Dewar के एक आविष्कार से आप सभी जरूर परिचित होंगे | जो चाय को गरम रखने वाला thermos flask आपने कभी इस्तेमाल किया है , दरअसल Dewar ने पहली बार ऐसे बर्तनों का अविष्कार ठन्डे को ठंडा रखने के लिए किया था (आज हम इन्हें गरम को गरम रखने के लिए उपयोग में लाते  हैं ) | ऐसे बर्तनों की दो दीवारें होती हैं जिनके बीच से हवा को निकाल दिया जाता है | ऐसे में अन्दर रहने वाला द्रव, बाहर के तापमान से आसानी से प्रभावित नहीं होता और गरम का गरम या ठन्डे का ठंडा रहता है | द्रव के रूप में ठंडी गैसों को लाने ले जाने में ऐसे ही बर्तनों का प्रयोग होता है, जिनको Dewar से सम्मान में dewar ही कहते हैं | द्रव hydrogen का प्रयोग राकेट इंधन के रूप में होता है | आजकल पेट्रोल की कमी के कारण इसको गाड़ियों में भी सुरक्षित रूप से प्रयोग करने के लिए शोध चल रहा है |

किसी भी फिल्म के climax की तरह , 1911 में इस कहानी की  सबसे महत्त्वपूर्ण घटना हुयी | Helium नाम की गैस को  को Heike Kammerling Onnes ने शून्य से 269 डिग्री सल्सियस नीचे जाकर द्रवित करने में सफलता पायी | इस तापमान पर एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण आविष्कार हुआ – superconductor का | उन्होंने पाया की इस तापमान पर कई धातुओं , यानी metals का resistance शून्य हो जाता है | Mercury यानी पारे की एक अंगूठी बनाकर, उसको द्रव helium से ठंडा करके  उसमें अगर करंट दौड़ा दिया जाये तो यह करंट अनंतकाल तक बिना किसी स्रोत के दौड़ता रहेगा | यह बहुत अचंभित करने वाला परिणाम था ! इसने विज्ञान को नयी दिशा दिखाई और आज जो आपके अस्पतालों में MRI यानी magnetic resonance imaging स्कैन होता है, उसके शक्तिशाली चुम्बक इसी superconductor के बने होते हैं और यही द्रव helium वहां भी लोगों के रोगों को पहचानकर उनकी जान बचा रहा होता है ! superconductors पर भी कभी मंथन करने का मौका मिला तो हम अवश्य प्रयास करेंगे | उसकी कहानी फिर कभी |

हमेशा की तरह, फेसबुक पोस्ट पर आपके प्रश्नों, सुझावों व टिप्पणियों का स्वागत है |

छविस्रोत: https://www.wessexscene.co.uk/news/2013/11/09/creative-collisions-review/

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